लोकमान्य तिलक के आदर्शों को मानने वाले स्व. श्रीनिवास बालाजी हार्डिकर ने बच्चों को वैज्ञानिक पद्यति से शिक्षा देने हेतु श्रद्धानंद पार्क के पास बाल मंदिर महाराष्ट्र मंडल की सन्न 1934 में स्थापना की | 1934 से 1948 तक श्री श्रीनिवास बालाजी हार्डिकर ने अपने मजबूत हाथों से इस संस्था को पल्लवित किया | आपके इस कार्यकाल में विद्यालय में मांटेसरी पद्यति पर शिक्षा से कक्षा 3 तक उत्तम शिक्षा व्यवस्था रही | देश के स्वतंत्र होने के बाद हार्डिकर जी का रुझान राजनीती की तरफ हो गया और विद्यालय की देख रेख महाराष्ट्र मंडल के हाथों में आ गयी और विद्यालय सचिव 1948 से कार्य और व्यवस्था देखने लगे | प्रथम सचिव श्री त्रि. आ. ताम्हणकर ने अपने श्रम बिन्दुओं से इसे सशक्त बनाने का भरकस प्रयास किया | उनके इस कार्य में बाल बंधू आचार्य कृष्ण विनायक फड़के जी का पूर्ण रूपेण सहयोग मिला | आदरनीय फड़के जी कानपुर नगर के ही नहीं देश के ऐसे महापुरुषो में थे जिन्होंने आजीवन एक बड़े शिक्षा शास्त्री होने के बावजूद बाल आन्दोलन का संगठन और नेतृत्व किया | वे गांधी युग के मूक साधको में से एक थे | स्व. फड़के जी की जयंती 8 अक्टूबर को बाल मंदिर महाराष्ट्र मंडल प्रतिवर्ष उनकी स्मृति में स्वरचित काव्यपाठ प्रतियोगिता का आयोजन करता है ।
सन 1949 में सुश्री सुधा वाखले अध्यापिका के रूप में शिक्षण कार्य प्रारम्भ किया और आगे चलकर प्रधानाध्यापिका का भार ग्रहण किया | श्री ताम्हणकर जी ने 1953 तक अपने कर्तव्य का पूर्ण रूपेण निर्वाह किया तथा वे इस संस्था को सदैव अपनत्व की दृष्टि से देखते थे सन 1 9 53 में दा. मो. कुंटे विद्यालय सचिव बने उन्होंने विद्यालय को प्रगति के पथ पर बढ़ाते हुए कक्षा 4 व् 5 की कक्षाएं प्रारम्भ की व संस्था की कमियों को दूर करने का भरसक प्रयास किया | जनमानस की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सन 1956 में कुंटे जी ने शिक्षा के प्रचार प्रसार हेतु महाराष्ट्र भवन खलासी लाइन में दूसरी शाखा का प्रारंभ किया | इस शाखा को प्रारम्भ हुए 60 वर्ष पूर्ण हो चुके है | पुरे वर्ष भर स्वर्ण जयंती के उपलक्ष में विभिन्य प्रतियोगिताएं एवं कार्यक्रम आयोजित हुए है
बाल मंदिर महाराष्ट्र मंडल खलासी लाइन शाखा 60 वर्ष से समाज की अपूर्णता दूर करने में अपना विशिष्ट योगदान दे रहा है नवीन घटनाये नये कर्तव्यों का सृजन करती गई प्रबंध समिति के सदस्यो एवं प्रधानाचार्या श्री मती सुशीला कौल के विद्यालय के प्रति त्याग समर्पित सेवाओं तथा विद्यालय की प्रगति हेतु उत्कृष्ट अभिलाषित संघर्षशील प्रयासों से विद्यालय में छात्रों की संख्या कक्षाओं में वर्ग संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती गई शिक्षा का उद्देश मस्तिष्क को विकसित करना है इस मंत्र का जाप करते हुए सुयोग्य शिक्षकाओं ने सहज ही अपने आदर्शो से शिक्षार्थी छात्र छात्राओं को शिस्टचारण से सजाया सुसंस्कृत किया एवं विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिभाग करने योग्य बनाया उपयुक्त शैक्षिक वातावरण के निर्माण समयानुकूल ज्ञानवर्द्धक अविर्भूत अपेक्षाओं एवं सामाजिक परिवेश की मान्यताओं के अनुरूप ‘विद्यालय में क्रमागत परिवर्तन एवं सतत क्रियाशील प्रक्रियाए अविराम चलती रही
सन 1982 में इसी विद्यालय की इंचार्ज सुश्री रंजना अरोड़ा ने विगत नेतृत्व में संजोई हुई मान्यताओं एवं परंपरा को सुरक्षित रखते हुए
प्रधानाचार्यो का कार्यभार संभाला एवं अपने कर्तव्य का यथा शक्ति निर्वाह किया आपने शांतिप्रिय होते हुए भी विद्यालय को बड़ी लगन से अनुसाशित एवं संचालित किया सन 1985 में सुश्री रंजना अरोड़ा के त्याग पत्र देने के कारण विद्यालय की वरिष्ठ अध्यापिका श्रीमती सुमति फालके को कार्यवाहक प्रधानाध्यापिका नियुक्त किया आपने बड़ी लगन से विद्यालय को संचालित किया सन 1986 में श्रीमती माधुरी केन्दूरकर को विद्यालय प्रबंध समिति ने प्रधानाध्यापिका नियुक्त किया शांतिप्रिय होते हुए भी आपने अध्यापन के साथ अनुशासन को विशेष महत्व दिया सन 1988 में श्री एस जी मातापुरकर विद्यालय सचिव नियुक्त हुए विद्यालय समिति के प्रयत्नों से 1989 में जूनियर हाई स्कूल की कक्षाएं प्रारम्भ की गयीं व् उन्हें कार्यरूप में परिवर्तित किया गया प्रधानाध्यापिका श्रीमती माधुरी केन्दूरकर के विद्यालय के प्रति त्याग समर्पित सेवाओं तथा विद्यालय की प्रगति हेतु उत्कृष्ट अभिलाषित संघर्षशील प्रयासों से विद्यालय निरंतर प्रगति करता रहा श्रीमती माधुरी केन्दूरकर के त्याग पत्र देने के कारण 1992 में श्रीमती रानी शुक्ल को प्रधानाध्यापिका नियुक्त किया गया अनुशासन को आपने विशेष महत्व दिया जीवन कार्य का ही दूसरा नाम है इस सूक्ति को आपने वरण कर जो ज्ञान शक्ति जो कार्यशक्ति जुटाई थी उसके सहारे अनायास ही सौंपी गयी गौरवशाली धरोहर के मान सम्मान सुरक्षा एवं संवर्धन हेतु आप निस्वार्थ सेवा एवं दायित्वों की सार्थकता हेतु प्रयत्नशील हैं
सन 2011 में विद्यालय में कक्षा दशम की कक्षाएं प्रारम्भ की गयीं महाराष्ट्र मंडल द्वारा संचालित यह विद्यालय तीन खंड के विशाल भवन में संचालित है विद्यालय के संस्थापक स्व. श्रीनिवास बालाजी हार्डिकर की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 23 जनवरी को उनकी जयंती पर अंतर विद्यालय भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है शिक्षा व्यवस्था में रत प्रबंध तंत्र के स्वपनो को साकार करती हुई इस संस्था के परिवार का प्रत्येक सदस्य निष्ठा एवं लगन से कार्यरत है बच्चों को नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूक बनाने एवं सदगुणो की शिक्षा प्रदान
करने हेतु समर्पित है निश्चल एवं अकृत्रिम जीवन की संरचना हेतु दृढ संकल्पित है बाल मंदिर महाराष्ट्र मंडल शिक्षण मंडल प्रबंध समिति पूर्व अध्यक्षों एवं कार्यवाह पूर्व सचिव पूर्व विद्यालय समिति के सदस्य गण महाराष्ट्र मंडल के पूर्व पदाधिकारियों भवन समिति के पूर्व एवं वर्तमान पदाधिकारियों समस्त महिला मण्डल महाराष्ट्रा मण्डल के समस्त सदस्य गण प्रबुद्धजनों समाजसेवी अभिभाववकों एवं छात्रों कर्मचारियों सहयोगी अध्यापिकाओं एवं वर्त्तमान प्रधानाचार्य छात्रवृत्ति प्रदानकर्ता सुभचिन्तकों अतिथि गणो परोक्ष एवं अपरोक्ष में साथ देने वाले सहृदयी महानुभावों का अपना विद्यालय है आप सभी ने विद्यालय को अनुकूल मार्गदर्शित कर संस्था को गौरवान्वित किया है आप सभी की दीर्घकालीन समर्पित सेवाओं का विद्यालय सदैव ऋणी रहेगा
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